Sunday, March 15, 2009

उफ ये विज्ञापन!

-अमित शर्मा-
मैं अपने दोस्त के घर बैठा गपशप लड़ा रहा था कि अचानक अखबार पढ़ते पढ़ते उसकी मम्मी हंसी। उनके ही पास बैठे दोस्त के पिता ने कहा `क्या हुआ, क्या पढ़ लिया?´ आंटी ने अखबार में देखते हुए ही कहा `बन जाओ पति नम्बर वन´ ये छपा है। उसके आगे लिखा वाक्य पढ़कर न सिर्फ उनकी हंसी गायब हो गई बल्कि एक झेंप मिçश्रत भंगिमा भी देखने को मिली, क्योंकि हम बच्चे वहां बैठे थे। अखबार में आगे लिखा था, अपनाइए जापानी तेल....
अब तक जिस वाक्य को वो किसी खबर या फिल्म के नाम की तरह लेते हुए सबकों हंसाने के मूड में थी उस पति नम्बर वन के विज्ञापन ने हम सभी को शमिZदा कर डाला।
कमोबेश यही हाल आज मीडिया के हर माध्यम पर देखने को मिल रहा है। चाहे वह समाचार पत्र हों या फिर टेलीविजन। यहां तक रेडियो भी इस फूहड़ कमाई की नव-मार्केüटिंग से ग्रस्त हो गए हैं। मैं आपको मेरे बचपन का ही एक किस्सा यहां संदभाüनुसार बताता हूं। आज से तकरीबन दस साल पहले, जब अधिकांश घरों में एंटीने के मार्फत दूरदर्शन ही देखा जाता था तब रविवार को किसी चर्चित सय धारावाहिक के बीच, तब तक असय धारावाहिकों की संख्या नगण्य ही थी, एक सेनेट्री नैपकीन का विज्ञापन आया। मैं जिस घर में बैठ कर टीवी देख रहा था वहां थर्ड क्लास में पढ़ने वाली बच्ची ने मेरी मौजूदगी में अपनी मम्मी से पूछ लिया कि मम्मी यह क्या होता हैै? तब उस सवाल का जवाब मैं भी नहीं जानता था। आंटीजी ने बखूबी उस सवाल को टाला। आज महसूस होता हैै कि शायद उस उम्र के बच्चे को कोई भी पेरेन्ट्स उस सवाल का जवाब नहीं दे सकते। सिर्फ टाला ही जा सकता हैै। पर आज। आज तो हर चैनल के हर कार्यक्रम में इन विज्ञापनों की बहार है। कब तक टालेंगे? और विज्ञापनों का स्तर भी आज इतना çछछोरा हो चला हैै कि न कहने को कोई शब्द हैैं न ही बोलने को। कंडोम के विज्ञापन बेहद अश्लीलता और बेबाकी से चैनल्स पर आ रहे हैैं। पुरुष साथी के बिस्तर पर मदहोशी से समाती स्त्री को दिखाते हुए एक्स्ट्रा टाइम, मस्ती, सही समय जैसे फूहड़ कैैच वर्ड देकर जो दृश्य माध्यम का माहौल उड़ाया जा रहा हैै, वो नितांत शर्मसार कर देने वाला है।
यही नहीं समाचार पत्र को एक बार फिर केçन्द्रत करना चाहूंगा। पहले मदाüनी शक्तियों का दावा करने वाले विज्ञापन पहले सिर्फ मैग्जीन्स में देखने को मिलते थे। फिर समाचार पत्रों के कुछ विशेष पृष्ठों पर सीमित रहे। पर आज की हालात निहायत ही शर्मनाक हैं।
और तो और एफएम चैनल भी रुपया बटारने की इस वाहियात मार्केटिंग में नग्न होते जा रहे हैं। ऑफिस आते समय जब एमएम सुन रहा था तो एक चैनल पर सांडे के तेल को इस तरह से बेचा जा रहा था जैसे बोनविटा सरीखा पुष्टीवर्धक पाउडर बेच रहे हों। मैं तो सिर्फ यही कहना चाहूंगा.... उफ! ये विज्ञापन, तौबा-तौबा!

अमित शर्मा
9829014088

10 comments:

Asha Joglekar said...

सही कहा ।

राजीव जैन said...

aajkal to aisa roz hi hota hai

har akhbar ki yahi kahani hai
badia likha

badhai

चिराग जैन CHIRAG JAIN said...

विज्ञापन एक आवश्यक बुराई है

रचना गौड़ ’भारती’ said...

ब्लोगिंग जगत में स्वागत है ।
लगातार लिखते रहने के लिए शुभकामनाएं
भावों की अभिव्यक्ति मन को सुकुन पहुंचाती है।
लिखते रहि‌ए लिखने वालों की मंज़िल यही है ।
कविता,गज़ल और शेर के लि‌ए मेरे ब्लोग पर स्वागत है ।
कहानी,लघुकथा एंव लेखों के लिए मेरे दूसरे ब्लोग् पर स्वागत है
www.swapnil98.blogspot.com

वन्दना अवस्थी दुबे said...

ब्लौग-जगत में आपका स्वागत है. शुभकामनायें.

Akhileshwar Pandey said...

सौ फीसदी खरी बात। शुभकामना स्‍वीकार करें। लिखते रहें।

गोविंद गोयल, श्रीगंगानगर said...

sahi bat pakdi hai janab. narayan narayan

अभिषेक मिश्र said...

Pida vajib hai apki, Swagat.

gazalkbahane said...

ब्लॉग जगत में स्वागत- आप सकारात्मक दृष्टिकोण रखते हैं यह सुखद पहलू है जीवन का
श्यामसखा‘श्याम
मेरे ब्लॉग
http://gazalkbahaane.blogspot.com/
http://katha-kavita.blogspot.com/

विनोद बिश्नोई said...

u r right sir, but how can we stop it ??????