आलोचकों की जहर सरिता में मीडिया का स्नान संस्कार
-अमित शर्मा-
हम पत्रकार हमेशा से ही आलोचना का शिकार रहे हैं। फील्ड से ज्यादा अखबारी कटघरे में भी दुनिया जहान के लिए संघर्ष करने के बाद भी हम आलोचना का शिकार होते आए हैं। हमारे पीठ पीछे तो हमारी बिरादरी की आलोचना प्रति सैकेंड सैंकड़ो जिव्हाओं से होती ही रहती है लेकिन यहां जिक्र कर रहा हूं, मीडिया के औपचारिक आलोचना समारोह की। जीं हां, आप सही समझे। मेरा इशारा ऐसी संगोष्ठी की ओर है जिसका विषय तो मीडिया के साथ फलां फलां जोड़ कर चिंतन का बताया जाता है लेकिन वहां होती विशुद्ध रूप से मीडिया की आलोचना ही है।
मार्च के पहले शनिवार को यहां जयपुर की सांस्कृति हृदयस्थली जवाहर कला केन्द्र की एक कला दीघाZ में ऐसी ही संगोष्ठी रखी गई। भोपाल के प्रख्यात चित्रकार प्रभु जोशी ने इस गोष्ठी का आयोजन रखा था। अपनी पेेंटिंग एग्जीबिशन के लिए जोशी जयपुर आए हुए थे और वहीं उन्होंने अपने कला जगत के मित्रों के गेट टु गैदर के लिहाज से यह संगोष्ठी रख ली। इससे पहले की गोष्ठी का लाइव टेलिकास्ट करूं, प्रभू जोशी से मेरे परिचय की कहानी में बता देता हूं, ताकि मेरे जहन में जो उनका प्रतिबिम्ब था वो भी सामने आ जाए। करीब ढाई वर्ष पूर्व जब मैं बंगलौर पत्रिका में चीफ रिपोर्टर था तब मेरा एक रिपोर्टर आउटलुक का ताजा अंक मेरे पास लाया और कहने लगा हिन्दी भाषा के मौजूदा स्वरूप पर क्या कमाल का आर्टिकल छपा है। आउट लुक के लगभग मध्य पृष्ठों पर छपे इस दो पेज के आर्टिकल के पहले ही अनुच्छेद ने इतनी उत्तेजना और उत्सुकता भर दी की उसे जोर जोर से बोलकर पढ़ना और भाव को गहराई से समझना जरूरी हो गया था। उस लेख में बाजारवाद का शिकार होते अखबार और औपनिवेशवाद का शिकार होती हिन्दी का जिक्र कमाल की बेबाकी से किया गया था। लेख को लिखने वाले स्थान पर प्रभू जोशी का नाम था। नाम के साथ कोष्टक में छपा था, लेखक प्रख्यात चित्रकार हैं। उस लेख से मैं इतना प्रभावित था कि हिन्दी भाषा से संबंधित हर व्याख्यान, या अकसर दफ्तर मे होने वाली चर्चा में उसका जिक्र छेड़ देता था। कुछ दिन पहले अखबार के उन हाई क्लास बताए जाने वाले पेज थ्री टाइप सप्लीमेंट्स को टटोल रहा था, जिसे बुद्धिजीवी वर्ग पढ़ना तो क्या देखना भी पसंद नहीं करता। इन्हीं कलात्मक खबरों वाले पृष्ठों पर छपा था कि प्रभू जोशी के चित्रों की प्रदशZनी कल से जयपुर में। अब इन बीते सालों में मुझे बस इतना ही याद रहा कि वो यादगार लेख प्रभू जोशी ने ही लिखा था। सोचा चलकर देख लिया जाए। अगर अलौकिक शब्दों को लिखने वाले हाथ हुए तो चूम लेंगे, नहीं तो एिग्जबिशन देखकर लौट आएंगे, यही सोच कर मैं जवाहर कला केन्द्र पहुंचा। यहां प्रभू के हाव भाव देख कर ही अंदाजा हो गया कि ये वही शख्स हैं। कॉफी हाउस में चाय की चुस्कियों और सॉस में डुबोकर कटलेट खाने के दौरान उन से हिन्दी भाषा को लेकर काफी बातें हुई। अब जब मीडिया व कला जगत पर गोष्ठी के लिए उनका फोन आया तो शुक्र मनाया कि गोष्टी शनिवार को है और साप्ताहिक अवकाश के चलते वहां पहुंचा जा सकता है।
अब बात अपनी आलोचना की, मेरा मतलब गोष्टी से है। गोष्टी की शुरूआत प्रभू ने अपने उसी आउटलुक के लेख के शब्दों से की, कि बाजारवाद की टेन प्लेटफार्म पर खड़ी है,.........। शायद मुझसे मिलकर उन्हें अपना लिखा पुन: स्मरण में आ गया होगा। गोष्ठी का क्रम कलाकारों की कटु चर्चा के साथ शुरू हुआ। मजे की बात यह है कि पहले वक्ता का पहला वाक्य था आज मीडिया कहां है, किस दिशा में है! और अंतिम वक्ता का अंतिम वाक्य भी यही था कि एकदम लापरवाह मीडिया के हाथों में आज की कला कलंकित हो रही है। ख्ौर, इतनी जल्दी अंत तक पहुंचना उचित नहीं होगा। पहले वक्ता के पहले वाक्य से ही दिमाग में कौंधने लगा कि इन्हें तुरंत जवाब दूं और बताउं की मीडिया यदि इतना बेपरवाह होता तो स्थिति आज की परिस्थितियों से एक हजार गुना खराब होती। लेकिन कुछ बोलने से पहले ही यह सोचकर चुप हो गया कि सबको बोलने दो फिर अपनी बात रखूंगा। लेकिन जनाब, तीसरे वक्ता के जहर उगलते उगलते तक तो मेरी कम उम्र ने जतला दिया वो अब तक के अर्जित अनुभव पर भारी है। और मैं बीच में बतौर मीडिया प्रतिनिधि बोलने लगा। अब तक के वक्ताओं की शिकायत नौसीखिए पत्रकारों से थीं। मैंने जवाब दिया कि जैसे एक चित्रकार नई कूची को कैनवास पर आने से नहीं रोक सकता, एक इतिहासकार सड़कछाप लेखक को बेहूदा कविता लिखने से नहीं रोक सकता। ठीक ऐसा ही हमारे तबके में है, हम नए या यू कहें कि नादान ग्लैमर-आकांक्षी पत्रकारों को इस जमात में आने से नहीं रोक सकते। अब तक उठे कई सवालों का मैंने स-तर्क जवाब दिया। पर साहब एक महिला चित्रकार ने तो यह कहकर मेरी जुबान ही बंद कर दी कि हमें इससे क्या मतलब कि आप पर कितना प्रेशर होता है, एक कलाकार तो सिर्फ अपनी कवरेज चाहता है। उन्होंने जब यह कहा कि संगीत की खबरें तो फिर भी बहुत छप जाती हैं लेकिन हम चित्रकारों की बहुत कम, तो मुझे लगा कि यहां तो कला में ही सरहदें खींच ली गई हैं, इनको जवाब देने का भी भला क्या औचित्य! ख्ौर, मेरे आक्रामक तेवर देखकर प्रभू ने गोष्टी की दिशा साहित्य की ओर मोड़ दी और राजस्थानी लेखक हरीराम मीणा को बोलने के लिए कहा। इससे पहले दूरदशZन के पूर्व निदेशक नंद भारद्वाज, चित्रकार एकेश्वर हटवाल और विनय शर्मा बोल चुके थे। मेरी बात बीच में काटने वाली महिला चित्रकार मीनाक्षी भारती थी। गोष्टी आगे बढ़ती गई। हमारी जमात पर तीर चलते गए। सभी कला व साहित्य जगत के स्थानीय धुरंधरों ने जमकर जहर उगला। ऐसा लगा जैसे कि आजकल के अखबारों की तरह उन्हें भी बस सब गलत ही गलत दिख रहा है, कहीं कुछ अच्छा है ही नहीं। यकीन मानिए मैं उन लोगों से ज्यादा अब खुद को कोस रहा था। इसलिए नहीं कि मैं यहां क्यों आया, बल्कि इसलिए कि मैं बीच में क्यों बोला, मुझे तो इस मीडिया विरोधी चक्रव्यू को अंत में तोड़ने के लिए कृतसंकल्पित रहना था। वक्ता अरोप लगाए जा रहे थे और वहां मौजूद `मैं` `मीडिया`, पिसता चला जा रहा था। एक दो बार दोबारा‘शमा अपने आगे रखवाने का भी विचार आया, पर वो नििश्चत ही अशिष्टता होती। ख्ौर, अब कलाकारों की ओर से पत्रकारों के जहर स्नान संस्कार की बेला यह समापन की ओर थी।
संगोष्टी का समापन सेवानिवृत्त आईएएस व कलाविद् विजय वर्मा की शालीन वाणि के साथ हुआ। उन्होंने बड़े ही संयमित अंदाज में संतुलन बैठाया, जैसा कि एक औपचारिक अध्यक्ष का नैतिक कर्तव्य भी है। उन्होंनेे कहा कि आज की युवा कौम दरअसल पत्रकारिता का मतलब ही नहीं जानती, और ना ही आज के बाजारवाद में कभी जान पाएगी, तो उनसे इतनी बड़ी उम्मीद ही क्यों! उन्होंने सभी आलोचकों का मुंह बंद यह कहते हुए किया कि आप कलाकार पत्रकारिता से किस संतोष की उम्मीद करते हैं, सबसे बड़े असंतोषी तो आप कलाकार हैं। हलक के नीचे दो पैग मदिरा जाती नहीं कि सारा कलाकार बाहर आ जाता है। उन्होंने यह भा रेखांकित किया कि मीडिया भले ही अपना कर्तव्य ना निभा रही हो लेकिन उसका जो मूल दायित्व है वो तो निभा ही रही है। यदि ऐसा नहीं होता तो शायद हम यहां जुट ही नहीं पाते। यह सामने नोटिस बोर्ड प्रभू जोशी की एग्जीबिशन की कवरेज से भरा पड़ा है, ये मीडिया की ही देन है। वरना हममें से किसी को भी पता नहीं चलता कि जोशी की एग्जीबिशन यहां लगी है। उन्होेंने मीडिया पर भी कटु टिप्पणी की, मगर संयमित अंदाज में। यकीन मानिए शब्द उनके थे पर मुझे ऐसा लग रहा था भाव मेरे थे। संगोष्टी का समापन मेरी ओर इशारा करते हुए इस बात के साथ हुआ कि यहां इकलौता नौजवान पत्रकार बैठा है जिसने अपनी बात रखी। प्रभू जोशी ने संगोष्टी के समापन की जो औपचारिक बयानबाजी की वो कुछ यूं थी कि ``सारी दुनिया की आलोचना करने वाला मीडिया कभी अपनी आलोचना स्वीकार नहीं करता.....`` यह कहते हुए वो मुस्कुरा रहे थे, और मैंने भी उनके इस वाक्य को अपनी मुस्कान देकर सहमति की मुहर लगा दी.....
अमित शर्मा
डेस्क इंचार्ज
बीटीवी न्यूज
पता-श्री राम विहार-ए,
मान्यावास, न्यू सांगानेर रोड
मानसरोवर, जयपुर-302020.
9829014088
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment